मंगलवार, 23 नवंबर 2010

मुझको तुम आवाज ना देना...







मुझको तुम आवाज ना देना
पलक भिगो कर नहीं देखना
मै आवारा बादल हूँ तुम
मुझे देवता मत कहना

अपना ही नहीं है ठौर कोई
बेबस करता है और कोई
हवा ने बंदी बना लिया तुम
मेरी बंदिनी मत बनना

सपनो से बसा संसार कभी
मत कहना इसको प्यार कभी
विपरीत दिशाए है अपनी
तुम मेरी संगिनी मत बनना

कल परसों में  है मिटना
कैसे कह दू तुमको अपना
अंतिम यही नियति मेरी
इसे प्रेम तुम मत कहना

5 टिप्‍पणियां:

अपर्णा "पलाश" ने कहा…

आपकी रचना कई प्रश्न छोडती है जैसे .........

आवाज ना देंगे हम तुमको
पर तुम भी वादा ये कर दो
जब जब मौन करूं मै धारण
मेरी खामोशी को ना पढना

विरह वेदना की अग्नि में
भस्म अगर मै खुद को कर लूँ
राख को माथे पर धर कर
अश्कों का श्रिंगार ना करना

Dr Kiran ने कहा…

आवारा बादल आवारगी हूँ
हवा की बंदिनी
पवन की किरण
जीवन की संगिनी

past life therapist ने कहा…

बहुत ही प्यारा लिखा है भाई पवन जी
बस अब तो यही इच्छा है, कि आप ब्लोग की दुनिया मैं एक नया इतिहास बनायें. आपकी कवितओ मैन जो सादगी है वो तो बहुत ही प्यारी है

past life therapist ने कहा…

कृपया मैन को में पढें ।

Aditya Tripathi ने कहा…

मुझको तुम आवाज भी देना
मुझको तुम कोई साज भी देना
मैं हूँ जो आवारा बादल
हवा में चल कर साथ भी देना

तेरा मुझ पर हो जोर वही
जो लगे हवा का शोर कोई
संग हमेशा मेरे रहकर
सपनों को आकार भी देना

मेरे चंचल मन के पथिक को
मार्ग दिखा कर राह भी देना
मेरे सुख और दुःख में प्रीतम
बिखरे अश्कों को चाह भी देना

चाहे मेरी वो नियति हो
या फिर वो रुकी हुई सी गति हो
कर घूम घूम तुम सावित्री, कर जोड़ जोड़ मेरे टुकड़ों को
इस अस्तित्व को फिर से मान भी देना