सोमवार, 22 नवंबर 2010

सीख लो ...



















पतझड़ो के मौसम में मुस्कराना सीख लो 
हँसते हुए जहान को अपना बनाना सीख लो


फूल अगर मीत है तो कांटे भी गैर नहीं
हर किसी को अपने दिल से लगाना सीख लो


कुछ सुनाओ, गुनगुनाओ ये खामोशी ठीक नहीं
बुलबुल के पास जाकर कोई गीत गाना सीख लो


चाँद नहीं रात में तो रंज किस बात का
अमावास में धरती को जगमगाना सीख लो


सौ बार जनम लेने से इक दोस्त मिलता है
दोस्ती को जनम जनम तक निभाना सीख लो


'वो' रूठते है तुमपे अपना हक जमाने के लिए
रूठे हुए महबूब को फिर से  मनाना सीख लो

7 टिप्‍पणियां:

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

चन्द्र जी आपकी शिकायत मैंने दूर कर दी.

chandra ने कहा…

धन्यवाद जो आपने तुरंत मेरी बात सुनली अंतिम लेने तो बेहद रोमांटिक के साथ ज्ञानवर्धक....
कोई हक जमाने के लिए रूठता है मुझे तो मालूम न था

Harshkant tripathi"Pawan" ने कहा…

'वो' रूठते है तुमपे अपना हक जमाने के लिए
रूठे हुए महबूब को फिर से मनाना सीख लो.
bahut khub....

amar jeet ने कहा…

पवन जी वैसे तो सभी लाइने एक से बढकर एक है परन्तु हमें तो आपकी ये दो लाइने बहुत पसंद आई !
सौ बार जनम लेने से एक दोस्त मिलाता है!
दोस्ती को जनम जनम तक निभाना सिख लो!!

अपर्णा "पलाश" ने कहा…

आपकी नज्म के हर एक शब्द में सीख है ? जीवन में जब भी मुश्किलों से मेरा सामना होगा , ये मुझे हमेशा एक हौसला देंगी ऐसा मेरा विश्वास है ।
आपकी इस रचना को मै याद करने की पूरी कोशिश करूँगी ।

Manish ने कहा…

बहुत खूब .............

Dr Kiran ने कहा…

'वो' रूठते है तुमपे अपना हक जमाने के लिए
रूठे हुए महबूब को फिर से मनाना सीख लो
seekh liya