रविवार, 21 नवंबर 2010

जड़ता की ओर बढ़ते कदम; रक्तदान और अंगदान करना हराम

दारुल उलूम देवबंद ने एक  (अमर उजाला काम्पैक्ट २१नवम्बर पृष्ठ 20) फतवा जारी करके रक्तदान और अंगदान को हराम घोषित किया है. हालांकि उसमे यह भी जोड़ा कि करीबी रिश्तेदारों को खून दिया जा सकता है.आगे यह भी है कि कोई इंसान यदि अपनी उंगली काटे या खुद को गोली मारे तो वह गुनाह गार है क्योकि शरीर अल्लाह का दिया हुआ है और इंसान इसका मालिक नहीं है. दारुल उलूम देवबंद के दारुल इफ्ता के मुफ्ती जैनुल इस्लाम ने कहा कि जो चीज़ इंसान कि नहीं है उसे किसी दूसरे को देने का हक नहीं है.
अब मेरा प्रश्न है....
१.धरती पर कोई भी चीज़ इंसान की नहीं है फिर उनका इस्तेमाल करके सारे इंसान अल्लाह के विरुद्ध कार्य करते है ?
२. खुद की उंगली काटे तो हरामी, और जानवर जबह करे तो कुर्बानी ये दोगलापन क्यों? क्या जानवर इंसान ने बनाये है?
३. करीबी रिश्तेदार को खून दिया जा सकता है. जब  इस्लाम के अनुसार सारे मुसलमान आपस में भाईचारे से बंधे है तो करीबी कौन या दूर का कौन?   अपना मर रहा है खून चढ़ा दो गैर मरे तो मरने दो. वाह....... क्या भाव है?
४.दोगलेपन की हदे तोड़ता हुआ फतवा जड़ता और अज्ञानता के गहरे अँधेरे में अपने लोगो को धकेले के अतिरिक्त और कितना उपयोगी होगा ?

18 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

agar kal ke akhbaar me khabar sahee na huee to aapke khilaf islam ke kuprachar ka arop lagega.

बेनामी ने कहा…

जड़ता के मुखातिब कौन इस्लाम या देवबंदी या कोई और. आप कहना क्या चाहते है? आप किस विचारधारा के समर्थक है? आप हिंदूवादी है या इस्लामिक?

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

बेनामियों जी!
इस फतवे का जो सन्दर्भ मैंने पोस्ट में दिया है. कृपया उसे देखे. और रही बात विचारधरा कि तो मै मानववादी हूँ. जो संप्रदाय रीति या परंपरा मानव के कल्याण का विरोधी है उसका मै दृढ़तापूर्वक विरोधी हूँ. मै चाहता हूँ कि लोग अपने अपने धर्म को मानते हुए प्रेम से रहे कोई किसी के मजहब के बारे में अपशब्द ना कहे ना सोचे, मै पागलपन का विरोधी हूँ.चैतन्यता का अनुगामी हूँ. इसी के चलते पागल पन के प्रतीक इन फतवों या खाप से आये आदेशो को को मानवविरोधी मानता हूँ. और जड़ता की ओर ले जाने वाला मानता हूँ. मै फिर कहता हूँ कि मै सभी धर्मो का बराबर मात्र में सम्मान करता हूँ किन्तु किसी भी धर्म में जड़ता स्वीकार नहीं है ना ही वे लोग जो जड़ता को फैलाते है.
आगे से आपलोग नाम सहित ब्लॉग पर आये तो अच्छी बात होगी अन्यथा मै आपलोगों को गधों की श्रेणी में रखना ज्यादा पसंद करूगा.

अपर्णा "पलाश" ने कहा…

बेनामी जी यह पोस्ट २१ नवम्बर को लिखी गयी है , २१ नवम्बर के अखबार को पढने के बाद । कृपया टिप्पणी लिखने से पहले लेख को ध्यान से पढा भी कीजिये । और रही बात इस्लाम के खिलाफ आरोप लगाने की तो आप पहले तो यही पर बताइये कि इस लेख में गलत क्या लिखा गया है ।
उत्तेजित होना बहुत अच्छी आदत है
मगर बातों में कुछ वजन भी तो लायें ।
गर डर नही जमाने को अपनी बात सुनाने में
तो अपने नाम को भी जमाने के सामने लाये।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

ऐसे फतवे डस्ट बिन में जाते हैं ... बीमार सोच की उपज हैं ये ...

chandra ने कहा…

अनवर जमाल, तथाकथित हिन्दुस्तानी, भोले भले मासूम लोग क्या इस बात का कोई जवाब देगे.
वैसे आपकी कविताओं को मै मिस कर रहा हूँ.............

Dr Kiran ने कहा…

मुझे ये सब पसंद नहीं............
लेकिन शान्ति से पहले कराती का होना आवश्यक है
चन्द्र जी से सहमत
i strongly miss ur romantic world

बेनामी ने कहा…

aaplogo(hindu aur doosre mazhab) ko islaam ke bare me likhne ya charcha karne ka koi haq nahi hai
hamara mazhab sampurn satya par utra hai. apne ghar dekho jo girne wala hai.
islam zindabad.
naam samy ane par khud pata chal jayega.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

इस तरह के फतवे नितांत अव्‍यवहारिक और खेदजनक हैं। इनकी जितनी आलोचना की जाए कम है।

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

जाकिर भाई आप से मिलकर हार्दिक खुशी हुई आपका प्रोत्साहन और सत्साहस प्रगतिशील सोच को आगे बढायेगी. शुक्रिया
आपके लेखो का इंतज़ार रहेगा

ZEAL ने कहा…

.

हर मज का बस एक ही इलाज है इनके पास - फतवा !

.

ZEAL ने कहा…

मर्ज [correction ]

Harshkant tripathi"Pawan" ने कहा…

आप इन फतवों पे ध्यान ही क्यों देते हैं. मैंने तो आज तक इन्हें कभी भी सिरिअसली नहीं लिया. रही बात इसका समर्थन करने वाले धर्मान्धों की तो उन्हें सबसे पहले धर्म का वास्तविक अर्थ समझना चाहिए फिर कुछ बोलना चाहिए.

VICHAAR SHOONYA ने कहा…

वैसे मैं किसी की भावनाओ को ठेस नहीं पहुचना चाहता पर आपकी पोस्ट पढ़ कर मन में एक प्रश्न तुरंत कौंधा की अगर इन्सान अल्लाह के दिए शरीर का मालिक नहीं हैं तो सुन्नत क्यों की जाती है. क्या सुन्नत करना अल्लाह के दिए शरीर से छेड़खानी नहीं है. कोई बंद जवाब दे पाये तो ठीक और ना दे सके तो तो भी ठीक पर कोई भी मेरी बात को दिल पर ना ले.

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

वो तो समझिये कि दुनिया का भाग्य अभी बली है, जिसके बूते हम लोग आधुनिक युग में साँस ले पा रहे हैं. वर्ना कहीं इन लोगों का बस चले तो धरती पर पाषाण युग आने में कोई देर नहीं है..

एस.एम.मासूम ने कहा…

अच्छा लेख़., यदि आप को "अमन के पैग़ाम" से कोई शिकायत हो तो यहाँ अपनी शिकायत दर्ज करवा दें. इस से हमें अपने इस अमन के पैग़ाम को और प्रभावशाली बनाने मैं सहायता मिलेगी,जिसका फाएदा पूरे समाज को होगा. आप सब का सहयोग ही इस समाज मैं अमन , शांति और धार्मिक सौहाद्र काएम कर सकता है. अपने  कीमती मशविरे देने के लिए यहाँ जाएं

Tarkeshwar Giri ने कहा…

Sriman ji kya bat , bahut hi badhiya post dali hai aapne.

Aaj ka muslim samaj in ulte -pulte fatwo ke karan hamesha pareshan rahta hai,

S.S.Masum saheb ko chahiye ki kuch yanha par kanhe.

Rahi bat Anwar ki To idhar aane se darte hain, ki kanhi koi unke khilaf FATWA na suna de

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

मासूम जी, सिर्फ अच्छा लेख लिखने से काम नहीं चलेगा आप बताइये कि इन पागलों पर लगाम लगाने के लिए आप क्या करेगे.
मै सस्ती लोकप्रियता या टिप्पणी मात्र के लिए उल जलूल लिखना नापसंद करता हूँ. सिस्टम को सुधारने के लिए लिखता हूँ. सिरफिरों को अक्ल आये इसलिए लिखता हूँ. लोग आपस में प्यार से रहे इसलिए लिखता हूँ. मौसम की रूमानियत पे फ़िदा हूँ लोग भी टुच्ची चीजों को छोड़ कर प्रकृति से प्यार करे बीवी बच्चो मा बाप सारी रहनुमाई पर फ़िदा हो इसलिए लिखता हूँ.
और पूरे दम-ख़म के साथ कहता हूँ कि जब तक मुझमे होश का एक कतरा बाकी है इस धरती को सवारने का काम बखूबी करूगा.
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरते बदलनी चाहिए.