बुधवार, 17 नवंबर 2010

महीना दिसम्बर हुआ










कोहरे का घूंघट ,
हौले से उतार कर ।
चम्पई फूलों से ,
रूप का सिंगार कर ॥

अम्बर ने प्यार से   ,
धरती को जब छुआ ।
बरफीली ठंडक लिये ,
महीना दिसम्बर हुआ ॥

धूप गुनगुनाने लगी ,
शीत मुस्कुराने लगी ।
मौसम की ये खुमारी ,
मन को अकुलाने लगी ॥

आग का मीठापन जब ,
गुड से भीना हुआ ।
बरफीली ठंडक लिये ,
महीना दिसम्बर हुआ ॥

हवायें हुयी संदली ,
चाँद हुआ शबनमी ।
मोरपंख सिमट गये ,
प्रीत हुयी रेशमी ।।

बातों-बातों मे जब ,
दिन कही गुम हुआ ।
बरफीली ठंडक लिये ,
महीना दिसम्बर हुआ ॥

16 टिप्‍पणियां:

ana ने कहा…

bahut sundar likha hai aapne.........badhai

पलाश ने कहा…

भइया आपने त्तो नवम्बर में ही दिसम्बर का अहसास करा दिया । हाँ अगर मूँगफली और गजक भी आ जाती तो फिर तो क्या कहने थे ।

ZEAL ने कहा…

अम्बर ने प्यार ने ,
धरती को जब छुआ ।
गुलाबी ठंडक लिये ,
महीना दिसम्बर हुआ ...

wow ! quite romantic !

.

प्रेम सरोवर ने कहा…

Bahut hi sundar prastuti. Dhanyavad

एस.एम.मासूम ने कहा…

वाह PAWAN साहब दिसम्बर का एहसास अभी से आप की पोस्ट पढके होने लगा.
कोहरे का घूंघट ,
हौले से उतार कर ।
चम्पई फूलों से ,
रूप का सिंगार कर ॥

अम्बर ने प्यार से ,
धरती को जब छुआ ।
गुलाबी ठंडक लिये ,
महीना दिसम्बर हुआ .

vikas ने कहा…

sardion ke aagmann ka ek sundar ehssas kraya hai aapne.

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

आग का मीठापन जब ,
गुड से भीना हुआ ।
गुलाबी ठंडक लिये ,
महीना दिसम्बर हुआ ॥

दिसंबर के महीने की काफी तलब है आपको .....

बहुत खूब ....!!

chandra ने कहा…

हवायें हुयी संदली ,
चाँद हुआ शबनमी ।
मोरपंख सिमट गये ,
प्रीत हुयी रेशमी ।।

बातों-बातों मे जब ,
दिन कही गुम हुआ ।
गुलाबी ठंडक लिये ,
महीना दिसम्बर हुआ
रूमानियत की हदे पार करता मधुर गीत
वाह गुरुवर

Dr Kiran ने कहा…

धूप गुनगुनाने लगी ,
शीत मुस्कुराने लगी ।
मौसम की ये खुमारी ,
मन को अकुलाने लगी ॥


गोरखपुर की याद ताज़ा हो गयी .....

past life therapist ने कहा…

bahut hi payara sa mausam ka varnan kiya hai bhai

Harshkant tripathi"Pawan" ने कहा…

दिसम्बर के पुर्वगमन पर अच्छी प्रस्तुति.

Harshkant tripathi"Pawan" ने कहा…
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DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

i love to write on nature i love to feel the nature i love to live the nature.
thanx to all who enjoy the nature with me.

chandra ने कहा…

जब तक आप अगली कविता नहीं लिकते तब तक मै इसी को पढ़कर प्यास बुझाऊगा.
आग का भीना पण जब गुड से मीठा हुआ
वाह..........

Manish ने कहा…

अम्बर ने प्यार से ,
धरती को जब छुआ ।
गुलाबी ठंडक लिये ,
महीना दिसम्बर हुआ ॥


मज़ा आ गयी. मुझे हमेशा से कोहरे की चादर ओढ़े सुबह बहुत पसंद है.

Tariq ने कहा…

Bahut sundar ,