बुधवार, 27 अक्तूबर 2010

..अरसे के बाद











आधी रात और
पूरा चाँद
मस्त हुआ मौसम
अरसे के बाद
कुछ इस तरह से मुझे
छू जाती ह सबा
जैसे हो  मेरे
बचपन की दिलरूबा
कुदरत की दुआ को
बाहों में लिया है मैंने
पिघलती चांदनी को
जीभर के पिया है मैंने
जोगन बनी सतरंगन
अरसे के बाद
शाद हुआ चाँद  
अरसे के बाद
पूरी हुयी बात
अरसे के बाद

3 टिप्‍पणियां:

Dr Kiran ने कहा…

जोगन बनी सतरंगन
अरसे के बाद
शाद हुआ चाँद
अरसे के बाद
पूरी हुयी बात
अरसे के बाद
nice lines

पलाश ने कहा…

बहुत अच्छी रचना । हाँ मै आप्को धन्यवाद भी देना चाहती हूँ , आपकी रचनायें अक्सर मेरा शब्द्कोष बढा देती हैं ।

निर्मला कपिला ने कहा…

कुछ इस तरह से मुझे
छू जाती ह सबा
जैसे हो मेरे
बचपन की दिलरूबा
प्रकृ्ति इन्सान को इसी तरह लुभाती कि कि सब कुछ भूल कर उसके आनन्द मे खो जाता है। बहुत अच्छी सहज सरल रचना। बधाई।