गुरुवार, 30 सितंबर 2010

सितम्बर -अक्टूबर का महीना, यद्यपि अब भी मधु झरती है.............

सितम्बर -अक्टूबर का महीना मुझे बसंत के महीने से कम रोमांटिक नहीं लगता सुबह की हल्की धुंध  और सरगोशियो से भरी हुई शामे मुझे हमेशा ही एक पुरकशिश रूमानियत का अहसास कराती है. ये दिन मुझे मेरे अतीत में ले जाते है और मधुर यादो के झूले में मै आराम से बैठ कर उनदिनों को करीब से देखता हूँ. मुझे याद है की जब मै मिडिल में पढता था तो स्कूल में अक्टूबर में तिमाही इम्तहान ख़त्म हो जाते थे और हम  सभी पढाई के बोझ से मुक्त होकर गिल्ली डंडा , कंचे और कामिक्सो में खो जाते थे. मुझे विज्ञान प्रगति नंदन और सुमन सौरभ पत्रिकाए बेहद प्रिय थी. खासतौर से जयप्रकाश भारती जी का संपादकीय. खेतो में धान की फसल कट गयी होती थी और जुते खेतो में से निकली सोंधी महक आज तक मेरे जेहन में बसी हुई है. मेरे भैया खेतो में रेडिओ सुनते हुए पाटा  लगाया करते थे कभी -कभी हम बैलो के पीछे पाटे  पर खड़े होकर खेतो का पूरा चक्कर लगाते. दशहरे का समय करीब होने के कारण हमलोग बास की टहनियों से धनुष और सरकंडे का बाण बनाया करते थे और फिर भयकर युध्ध  भी होता था. कानपुर आने के बाद मेरी शामे  यहाँ पर एक जगह संजय वन है, वहा गुजरती थी. मेरे एक सुहृदय है राज कुमार जी वो और हम अक्सर वहा एक पेड़ की डाली पर बठकर प्रकृति   के सौंदर्य  में अपनी प्रेयसियो की कल्पना करते हुई देर शाम तक गीत गाते रहते थे.
राज कुमार गाना बहुत अच्छा  गाते है जब भी अक्टूबर  की शुरुआत होती है मुझे उनका गया गीत "चाँद सी महबूबा हो मेरी कब ऐसा मैंने सोचा था " याद आता है.  राज कुमार उस समय एक लडकी से प्यार करते थे उनके गानों में एक अजीब किस्म का मिठास मै महसूस करता जो बाद में एक टीस पैदा करता था. जब दिन ढल जाता था तो बड़ा सा चाँद पेड़ों  की शाखों के  पीछे  धीरे से  ऊपर आता था और उसकी  छन छन  के आती रौशनी मन में एक अकुलाहट भर देती थी. मै तब जान कीट्स को अपने बहुत आस पास पाता था. एक बार प्राकृतिक सुन्दरता की मदिरा पीने के लिए मै संजय वन में रात के तीसरे पहर तक बैठा रहा. आज जो कवित्ताये आप लोग पढ़ते है उनका स्रोत यही सितम्बर अक्टूबर की शामे और राते है.एकाध का आनंद  लीजिये........


यह चित्र १९९८ का है संजय वन में अक्टूबर महीने में चाँद की रोशनी से नहाई शाम...








 तीसरे पहर की चांदनी
आती निःशब्द झरोखे से
जैसे तुम आती चुपके से

पाकर वह एकांत मुझे
बाते कहती भूली बिसरी
सारी रात जगा कर सखी
कहती जाती बाते तेरी

मन को विह्वल करती है
सुधियाँ  बीते पल छिन की
एक गहरा शून्य उभरता है
जब बाते होती जीवन की

चादनी तुम वापस जाओ
जहा रहती है वो सखी
वो बाते कहना उससे जो
बानी मेरी कह ना सकी

संसार बना निःसार प्रिये
यद्यपि अब भी मधु झरती है
शरत चंद्र के यौवन से
सुरभित कुसुमो के उपवन से

यद्यपि अब भी मधु झरती है
ओस की फूटती बुन्दों से
हरसिगार की गन्धों  से
                            यद्यपि अब भी मधु झरती है.............

10 टिप्‍पणियां:

Dr Rakesh Kumar ने कहा…

कभी विद्यार्थी जी की झलक कभी कीट्स की. आप हो क्या? वैसे यह पोस्ट लाजवाब है

Dr Kiran ने कहा…

आपकी इसी अदा पर मै फ़िदा हूँ. बहुत दिनों के बाद मुझे अपनी पसंद की पोस्ट पढने को मिली. आभार, आगे भी ऐसी और रोचक प्रसंग पढने को मिलेगे इसी अंदाज़ में उम्मीद करती हूँ.
धन्यवाद

Harshkant tripathi ने कहा…

यादों के साथ मधु झरती हमेशा झरती रहेगी. बहुत सुन्दर यादें आपने मुझे भी अपने बचपन की तरफ खींचे चले जानो को विवश कर दिया . अछि पोस्ट जमाये रहिये पछुआ पवन को ऐसे हीं........

पलाश ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
पलाश ने कहा…

i also love to remember
month of October and September
its request from dartee & amber
please write some about December

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

प्रिय पलाश जी दिसंबर के बारे में दिसंबर में ही कह पाऊंगा. तब तक प्रतीक्षा करिए.......

Manish ने कहा…

mazaa aa gaya.....

Manish ने कहा…

मन को विह्वल करती है
सुधियाँ बीते पल छिन की
एक गहरा शून्य उभरता है
जब बाते होती जीवन की

Purani Yadein Taza ho aayi......

बेनामी ने कहा…

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