बुधवार, 29 सितंबर 2010

मै गणेशशंकर विद्यार्थी जी को फालो करूगा.

थोड़ी देर बाद फैसला होने वाला है. क्या फैसला आएगा शायद सट्टेबाजो को इससे बेहतर मौका नहीं मिलेगा सट्टा लगाने का. मै सोचता हूँ कि शायद अगली तारीख के लिए फिर मामला बढ़ जाएगा. शायद शक्ति तय  करेगी कि कौन जीतेगा. जो भी हो, जो हो रहा है कुछ अच्छा नहीं लग रहा है. फ़ोर्स के बूटो कि आवाज़ सुनकर एक अजीब सा डर लग रहा है. लोग अपने घरो में कई दिनों के लिए राशन रख लिए है. सभी मानकर चल रहे है कि दंगे फिर होने वाले है. भेड़िये अब अपने खोल से बाहर आयेगे, और झपट्टा मारेगे दुकाने जलाई जायेगी लोगो को क्रूरता के साथ काटा जायेगा औरतो का जुलूस निकला जायेगा. हवानियत बच्चो को भी कुचलने से नहीं छोड़ेगी. यह सब कुकृत्य पुण्यता कि ओट में होगा.
मै क्या करू? सारे तथाकथित  बुद्धिजीवी ब्लॉग या संचार के अन्य माध्यमो से एक सुरक्षित जगह पर बैठकर रुदन और सियारों जैसा प्रलाप करने में जुटे है. मेरे लिए भी शायद यही रास्ता है कि मै भी उन सियारों कि तरह हुआ हुआ करने लगू लेकिन .............
मै बुद्धिजीवी होने से इनकार करता हूँ. कल मै कानपुर के सबसे तनावपूर्ण इलाके चमनगंज बेकनगंज और बजरिया में गया था. वहा लोगो से बातचीत करने के बाद यह महसूस किया कि लोग नहीं चाहते कि दंगा हो. रोज़ कमाने खाने वाले लोग जो दो जून कि रोते के लिए सुबह शाम रात तक काम कि तलाश में रहते है उनको दंगे से क्या मतलब ? लेकिन उनमे से कुछ लोग बोले कि मजबूरीवश यदि दंगा होता है तो वे उसमे भाग लेगे क्योकि बात ताकत और उत्तरजीविता कि आती है. ये वो लोग है जो दूसरो से नियंत्रित होते है. दंगे  का क्या कारण है कुछ लोगो को इससे भी मतलब नहीं है वे तो दंगे को एक सौभाग्य के रूप में देखते है  जिसके चलते वे मालामाल होने को है.
मै निष्कर्ष पर पहुचता हूँ कि यदि फैसला टलता भी है तो दंगे का टलना हो मुमकिन नहीं दीखता. ऐसे में मै गणेशशंकर विद्यार्थी जी को फालो करूगा.

1 टिप्पणी:

nilesh mathur ने कहा…

सांप्रदायिक सौहार्द बना रहे!