मंगलवार, 28 सितंबर 2010

काफ़िर से मुहब्बत कर बैठे












बात बहुत छोटी सी थी
दुनिया से अदावत कर बैठे
अल्लाह कि इबादत छूट गयी
काफ़िर से मुहब्बत कर बैठे


मीठे अश्को से इश्क हुआ
खुद के होने पर रश्क हुआ
अब छुप के मिलना कैसा
जब नज़रे इनायत कर बैठे


मेरा यार ही मेरा मज़हब
दीन धरम ईमान और सब
उसको खुदा बना करके
ज़न्नत से बगावत कर बैठे


काजी का फ़तवा आया है
दोजख  का डर बतलाया है
पर उसको धता बता कर हम
आज क़यामत कर बैठे
          
                     काफ़िर से मुहब्बत कर बैठे.......

 

3 टिप्‍पणियां:

Harshkant tripathi ने कहा…

बहुत सही कहा आपने. मेरी भी सुन लीजिये.........
यह सोच कर रखते रहे हैं मुहब्बत से हम दूरी
डर है कि कही किसी काफ़िर से कुछ ऐसा न कर बैठें.

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

एक बार अलीगढ के एक चर्चित शायर ने फ़िराक गोरखपुरी से कहा
"काफ़िर है वो जो कायल नहीं इसलाम के"
तो फिराक साहब ने जवाब दिया ,
लाम # के मानिंद है गेसू मेरे घनश्याम के
काफ़िर है वो जो कायल नही इस लाम के.

#लाम उर्दू का अक्षर है जो s जैसा होता है
गेसू का मतलब केश होता है

पलाश ने कहा…

खुदा है खुश ये देखकर
तुम उससे बगावत कर बैठे
और फक्र है इस बात पर
कि काफिर से मोहब्बत कर बैठे
जो कर ना सके हम बरसो में
तुम वो बगावत कर बैठे
अश्कों से इश्क जता कर तुम
मुस्कुराहट की शिकायत बन बैठे