शनिवार, 18 सितंबर 2010

घट-घट व्यापित राम और स्टीफन हाकिंग


ईश्वर क्या है? मै कभी कभी  इस प्रश्न पर तर्क वितर्क करता हूँ ,कभी  ये सोचता हूँ की सारा विश्व संयोगवश उत्पन्न हुआ है कभी सोचता हूँ कि इसके पीछे कोई नियंता है और अंत  में मेरा इसी निष्कर्ष पर होता है. मै यह कभी नहीं मान पाता की स्टीफन हाकिंग सही है मुझे यह लगता है की इस संसार को नियमित करने वाली कोई शक्ति है जो विभिन्न स्वरूपों में विद्यमान  है यदि उसे राम के रूप में माना जय तो राम  के रूप में अनुभव होगा रहीम के रूप में माने तो उसमे अनुभव होगा प्रत्येक कण में उसकी व्यापकता मुझे दिखती है.
कहा गया है घट-घट  व्यापित राम
ईश्वर की मूल सत्ता के अलावा जो भी  शेष है उससे केवल सामाजिक  और राजनीतिक मायने है. ईश्वर के नाम पर लड़ने वाले लोग या तो निरे मूर्ख है या चतुर राजनीतिज्ञ . ईश्वर के अस्तित्व   में ना विश्वास करने वाले लोग भी किसी ना किसी बिंदु पर प्रकृति की सत्ता स्वीकार करते है यदि  प्रकृति को हम ईश्वर की संज्ञा दे दे तो नास्तिकता की अवधारणा   ही खत्म हो    जायेगी. वस्तुतः नास्तिकता  शाब्दिक जंजाल  से ज्यादा कुछ नहीं है . धार्मिक कर्मकांड आम जन को ईश्वर से दूर  और पुरोहितो /पादरियों/मुल्लाओ इत्यादि के करीब लाते है. इस प्रकार ज्ञान का ह्रास होता  है और भक्ति भाव या दास्य भाव में वृद्धि   होती है. श्रीकृष्ण   गीता में ईश्वर प्राप्ति के लिए ज्ञान मार्ग को सर्वोच्च  बताते है. ज्ञान को जल से पतला कहा गया है किन्तु   जल के विच्छेदन में स्टीफन हाकिंग अपने को संभाल नहीं पाए और विच्छेदित ज्ञान बघारने लगे.
पदार्थ की अविनाशिता के नियम के अनुसार पदार्थ को ना तो उत्पन्न किया जा सकता है और ना ही नष्ट किया जा सकता हैकेवल रूप परिवर्तन ही संभव है. ईश्वर भी अजन्मा और अविनाशी है . इसका मतलब यह हुआ की प्रत्येक  द्रव्य में ईश्वर है. अब हम उसे रमजान अली में खोजे या बजरंग बली में खोजने वाले को अपने अपने इष्ट जरूर मिलेगे. किन्तु आगे  की कहानी राजनीतिक हो जाती है रमजान  अली और बजरंग बली के सहारे हम सत्ता पाने का ख्वाब देखने लगते हैऔर तब प्रकृति इस मूर्खता पर युध्ध रूपी अट्टहास करती है
सीधी सी बात है की किसी के मानने या ना मानने से ईश्वर की सत्ता  पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला फिर वो हाकिंग हो या कोई और
मै जानता हूँ कि ....
ज़र्रे ज़र्रे में दिखता है तू
जो कहता हूँ सुनता है तू
मै हँसता रहू इसलिए शायद
मेरे दर्द सहता रहता है तू
     घबरा जाता एक छौने सा तो
     अपने में छुपा लेता है तू
     माँ के सरीखा गोद में लेकर
     मुझपर प्यार लुटाता है तू
                                मुझपर प्यार लुटाता है तू..............




4 टिप्‍पणियां:

Harshkant tripathi"Pawan" ने कहा…

Vicharniy post. Nirantarata banaye rakhiye,,,,,,,,,,,

Dr Rakesh Kumar ने कहा…

haking bhartiya theory ko nahi janta ye vo ullu hai jo din me rat ko dekhta hai

Dr Kiran ने कहा…

ये सब बाते मेरी समझ में नहीं आती आप की रूमानी कविताएं मुझे प्रिय है..................

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पलाश ने कहा…

the GOD is nothing but it is only the faith . and when we are saying that GOD listen us is only a believe not the truth , if mathematically i will say its just a probability function . as we now about our self our believed increases and we said that i am near to GOD. so i think the place where life is possible at hat peace GOD exist.