शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

दुनिया खड़ी है बनकर इक चीज़ बाज़ार में




















दुनिया खड़ी है बनकर इक चीज़  बाज़ार में
पैसे हो अगर जेब में तो  आना बाज़ार में.
हर किसी की यहाँ पर सूरत बदल जाती है
बीमार भी बनकर खड़ा मसीहा बाज़ार में.
धरम करम कहते है जो दिन के उजालो में
रात को उनकी गली खुलती है बाज़ार में.
वीरान गुलिस्तान में मरघट सी वहशत है
भंवरों ने यहाँ बेच दिया गुल को बाज़ार में.
आबाद है ज़हान जिनके खून की हर बूँद से
आखिर में लाश उनकी नीलाम है बाज़ार में.
हर शाम-ओ-रात  अंधेरो में  गुजरती है यहाँ
कुछ लोग चरागों को बुझाते है बाज़ार में.

3 टिप्‍पणियां:

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

बहुत बढ़िया भावपूर्ण रचना ....

arun c roy ने कहा…

bahut bahvopoorn , sarthak aur manovaigyanik kavita ! aapka industrial sociology wala background kavita me jhalk raha hai ! sunder !

past life therapy ने कहा…

आबाद है ज़हान जिनके खून की हर बूँद से
आखिर में लाश उनकी नीलाम है बाज़ार में.
karara thappad mara hai aapne