गुरुवार, 29 जुलाई 2010

झज्झर का यक्ष प्रश्न?????













ब्राह्मण  देव मुझे छूने से
इतना क्यों घबराते है
नारायण की  चौखट पर
सारे अंतर  मिट जाते है
मै भी  बना  पंच तत्वों से
प्रभु ने रचा मनोयोग से
क्या जल अछूत पावक अछूत
धरती अछूत अम्बर अछूत
अपने स्वारथ में रत होकर
मानवता को बाँट  दिया
ज्ञान मुझको वंचित कर
अज्ञानी का नाम दिया
प्रभु के यहाँ अछूत ना कोई
वह सबको गले लगाते  है
वह सबको एक समझते है
समदर्शी कहलाते  है फिर,
ब्राह्मण देव मुझे छूने से
इतना क्यों घबराते है??????

9 टिप्‍पणियां:

Dr Rakesh Kumar ने कहा…

इस यक्ष प्रश्न का जवाब तथाकथित ब्राम्हणों के भी पास नहीं है एक ब्राम्हण होने के बावजूद आपने अश्पृश्यता पर जितने बेबाकी से अपनी राय रखी है उसके लिए आपके साहस और लेखनी की दाद देनी होगी
बधाई स्वीकार करे

पलाश ने कहा…

इतने गहन चिंतन और स्पष्टवादिता की प्रशंसा जितनी की जाये कम है किन्तु

ज्ञान मुझको वंचित कर
अज्ञानी का नाम दिया

इस बात से मै सहमत नही और इसके दो कारण है
१ . हम यह कैसे मान ले कि ज्ञान की पूंजी ब्राह्मणों के पास ही होती है, जबकि कवि यह भी कहता है कि

नारायण की चौखट पर
सारे अंतर मिट जाते है


२. अगर ब्राह्मणों के पास वास्तविक ज्ञान होता तो फिर वह भेदभाव नही करता इसका तो यही मतलब निकलता है कि ब्राह्मणों से ज्यादा अज्ञानी कोई नही
अगर कुछ अनोचित कहा हो तो यह पाठिका क्षमा प्रार्थी है

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

प्रिय पलाशजी,
हमारा समाज संविधान से नहीं चलता यह आज भी मनुस्मृति से दिशानिर्देश प्राप्त करता है. मनुस्मृति में यह कहा गया है कि यदि वेदवाक्य किसी शूद्र के कानो में पड़ जाये तो उनमे पिघला सीसा डाल देना चाहिए. महाभारत में द्रोणाचार्य ने एकलव्य को शिक्षा देने से क्यों मना किया था? उसके पीछे पूरे शूद्र समुदाय को अज्ञानी बनाए रखने कि ही तो मानसिकता काम कर रही थी.ज्ञान सत्ता का प्रमुख साधन है. इसलिए पुष्यमित्र शुंग के समय से ही इस बाट को स्थापित कर दिया गया कि कोई भी शूद्र का बालक किसी प्रकार की शिख्सा प्राप्त ना कर पावे

sandhyagupta ने कहा…

aapki rachna kai sawal khade karti hai.shubkamnayen.

Harshkant tripathi"Pawan" ने कहा…

mere dekhne me ye sab ab biti baten ho gai hain, ab aisa kuchh dekhne sunne ko nahi milta. waise jab aisi bat hua karti thi us samay bhi kai jagah aise logon ko maryadit karne ke bhi kai prasang samne aaye hain.

पलाश ने कहा…

कविवर , मै आपके गूढ ज्ञान का सम्मान करती हूँ , किन्तु इन विचारों से सहमत नही। आप जिस मनुस्म्रति की बात कर रहे हैं , आज के इस समय मे कितने ऐसे लोग है जिन्होने उसे देखा भी है । और समाज संविधान से अगर ना चल रहा होता तो आरक्षण जैसे नियमों का तो अस्तित्व ही खत्म हो जाना चाहिये था। द्रोणचार्य ने शिक्षा देने से मना इसलिये किया क्यो कि उस समय वो समाज की व्यवस्था का उल्लंघन होता ।
क्यो लोग ऐसा सोचते है कि सारी बुद्धजीविता ब्राहमणों के ही पास है , “why others feeling that only bramans have the source of knowledge” और अगर समाज के लोगों की यही सोच है तो ऐसे ब्राहमणत्व को मेरा शत शत नमन है |

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

प्रिय पलाशजी,
मेरी यह रचना उन तथा कथित ब्राह्मणों के लिए है जो आज भी द्रोणाचार्य वाली व्यवस्था में यकीं रखते है. हमारा संविधान एक उधार के थैले से ज्यादा कुछ नहीं है जिसे बनाने वाले और आज संचालित करने वालही उसको पंगु बनाये है. आज भी हिन्दू समाज खासकर अगड़ा वर्ग मनुस्मृति के बताये नियमो कानूनों से चल रहा है. आनर किलिंग इसका जीवंत उदहारण है जिसमे मंत्री संतरी भी सन्निहित है. ब्राह्मणत्व को शत नमन करना आपकी महानता है किन्तु यह नमन किस अर्थ में है? मै समाज के कुचालियो का विरोध करता हूँ. आवाहन करता हूँ ऐसे युवक युवतियों का जो इस दीमक लगी सड़ी हुयी व्यवस्था का समूल नाश करने में मेरे साथ हो.आप ने इतनी रुची के साथ इस विषय को आगे बढाया साधुवाद .....

past life therapy ने कहा…

इन आलोचनात्मक और मार्मिक वार्ता लाप ने तो ग्रन्थो के हुइ पुनर्निर्मण के लिये एक और वेद व्यास की तलाश शुरू कर दी है

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

वेद व्यास की नहीं मनु की जरूरत है