बुधवार, 14 जुलाई 2010

यूं तो सावन झूम के बरसा.....

             








                   

                १.
यूं तो सावन झूम के बरसा
 पर एक मै ना भीग पाया,
नमी जिसमे  थी नहीं वो,
बादल मेरे हिस्से में आया.
                २.
आज  तक तो ना उछाला
एक भी पत्थर सनम,
पर ये दुनिया है कि कहती
ये पागल कहा से आया.
            ३.
रह-रह के ज्वार आता है
समंदर में  जानते हो क्यों,
उचक कर वो देखता है
मीत उसका क्यों ना आया.
             ४.
आंसू और मुस्कानों में
खिच ना पायी सीमा रेखा,
कभी ये आंसू मुस्काते है
कभी  हँसी   रोते    पाया.
             ५.
एक मुद्दत हो गयी है
आँखों  को  झपकाए हुए,
सांकल खट-खटा  रही है
परदेसी द्वार पर  आया.

7 टिप्‍पणियां:

Dr Kiran ने कहा…

are aaj itna dard ???????????????
vaise rachna bahut achhi hai dr saab

पलाश ने कहा…

आज मेरे पास शब्द नही है कुछ कहने के लिये
मगर सोचने के लिय बहुत कुछ है
बस ईश्वर से ये प्रार्थना जरूर करूगीं ये सिर्फ आपका लेख काल्पनिक ही हो
सच्चाई में आपको आपके जीवन में कोई भी कष्ट ना मिले

बेनामी ने कहा…

आज तक तो ना उछाला
एक भी पत्थर सनम,
पर ये दुनिया है कि कहती
ये पागल कहा से आया

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत-बहुत बधाई!
आपकी चर्चा तो यहाँ भी है-
http://mayankkhatima.blogspot.com/2010/07/2010.html

Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन अभिव्यक्ति!!

पलाश ने कहा…

no doubt its a good poem but mujhe to esme "BAL KAVITA" jaisa kuch samajh nahi aaya. pl Dr. Roop chandra ji kya aap mujhe guide kar sakte hai, i will be highly obliged to you .

Manish ने कहा…

maza aa gaya....