मंगलवार, 13 जुलाई 2010

........एक दिन तुमको भी जाना है.

अनमोल पलों को खोकर हम
कुछ नश्वर चीजे पाते है
और उस पर मान जताते है
यह अभिमान छणिक है बंधू
समय का कौन ठिकाना है
जो मंगल गीत बना उसको
निश्चित मातम बन जाना है.

घनघोर घटाए आती है
पल भर में प्रलय मचाती है
लेकिन अगले ही क्षण उनको
अपना अस्तित्व मिटाना है.
जैसे सागर की लहरे
तट पर आती मिट जाती है
इस धरती पर सबको वैसे
आना फिर मिट जाना है.
जो आज हमारा अपना है
कल और किसी का  होगा वह
सारे जग की यही रीत है
उस पर क्या पछताना है.
जग ठगता है हर पल पग पग
क्यों रोते हो ऐसा कह कर
देकर धोखा अपने तन को
एक दिन तुमको भी जाना है.

3 टिप्‍पणियां:

baat pate ki ने कहा…

kavita uttam darje ki hai

sandhyagupta ने कहा…

Gehri aur arthpurn rachna.shubkamnayen.

पलाश ने कहा…

जीवन के बहते दरिया मे
क्या खोना क्या पाना है
समय हमे बस याद रखे
ऐसा कुछ कर जाना है
ले ना जा पाओगे कुछ तुम
फिर क्यों छीने औरों से
ये लोभ भोग सब इक दिन
माटी में मिल जाना है
शब्द तुम्हारे अजर रहेगें
सदियां यही दोहरायेगीं
आज भले ना समझे दुनिया
कल इसे कुंदन बन जाना है