रविवार, 11 जुलाई 2010

...उस राह से गुजरे हुए कितने जमाने हो गए











जिस राह से गुजर कर उसके दीवाने हो गए
उस राह से गुजरे हुए कितने जमाने हो गए

कालेज की बाते मुझसे मत किया करो
मेरे 'उसके' किस्से बरसो पुराने हो गए

इन गलियों में आते हुए डर लगता है
यहाँ पर आकर  मेरे अपने बेगाने हो गए

जाते -जाते 'वह' मेरे आंसुओं को  ले गयी
इन सूखी पलकों पर सपने वीराने हो गए

बुलबुल भी चुप है मेरी ख़ामोशी को देखकर
इस गुलशन में उसके कितने तराने खो गए

कुछ कहने से पहले मुझे टोकती है हवा
सुनने वालो के दिल आजकल सयाने हो गए

8 टिप्‍पणियां:

पलाश ने कहा…

यूँ ही उम्र भर लिखते रहना
हर कविता में नये रंग भरते रह्ना
पुराने दिन पुरानी बातों को
जिन्दगी के हर मोड पर साथ रखना
भले मौका ना मिले तुम्हे
उन गलियों में जाने का
उनकी खुशबू को
सांसो में संजो के रखना
क्या पता कभी बिछ्डे मिल जाय कही
तस्वीर उनकी मन में बसाये रखना

Harshkant tripathi ने कहा…

कुछ कहने से पहले मुझे टोकती है हवा
सुनने वालो के दिल आजकल सयाने हो गए. bahut khub. aaj kal blog pe regular vivit nahi kar pa raha. nirantarta banane ka prayas karunga.

Manish ने कहा…

very very good lines.......

mazza aa gayi.

past life therapy ने कहा…

कालेज की बाते मुझसे मत किया करो
मेरे 'उसके' किस्से बरसो पुराने हो गए

rememberece of college days.

aanand aa gaya

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

मेरी ये पंक्तियाँ कालेज के उन दिनों की यादे है जब धर्मवीर भारती के लिखे उपन्यास गुनाहों का देवता हर छात्र-छात्रा के लिए गीता बन चुकी थी. मेरा एक शोध के सिलसिले में पिछले दिनों जिस कालेज में मै पढ़ा था, जाना हुआ, आँखे भर आयी. पर आजकल की स्थिति को देख कर मै ठगा सा भी रह गया. ना तो लडकियों में वो शर्मीलापन और कोमलता रही और ना लडको में ग्रेविटी. कालेज तो मशीनों और मुर्दों का अड्डा बन गया था.नग्नता, बेहयापन अपने शबाब पर थी. मै वापस लौटा तो मन भारी सा था. अपने मन की बाते सदा की तरह आपलोगों से शेयर की है सो इस पीड़ा को भी आपके ही सामने रखता हूँ.

Dr Kiran ने कहा…

ये कैसा शहर है ये कैसी हवा
न चंदर कोई न कोई है सुधा

सँधू हरदीप ने कहा…

बुलबुल भी चुप है मेरी ख़ामोशी को देखकर
इस गुलशन में उसके कितने तराने खो गए...

न रहो तुम खामोश...
कुछ तो कहो...
शब्दों के सहारे...
बुलबुल को चहका दो
गुलशन को महका दो ...

हरदीप

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत ही सुन्दर पोस्ट!
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इसकी चर्चा यहाँ भी की गई है-
http://mayankkhatima.blogspot.com/2010/07/blog-post.html