शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

परमेश्वर से तब मैंने बेटी मांग लिया











कई जनम के सत्कर्मो का
जब मुझको वरदान मिला
परमेश्वर से तब मैंने
सीता सी बेटी मांग लिया
        उलझा था जब दुविधा के
        कर्मक्षेत्र के कुरुक्षेत्र  में
       परमेश्वर से तब मैंने
       गीता सी बेटी मांग लिया
             एकाकी सा भटक रहा था
             निर्मोही जग डरा रहा था
             परमेश्वर से तब मैंने
             मीता सी बेटी मांग लिया

9 टिप्‍पणियां:

रचना ने कहा…

beti sita , geeta aur meeta sae bahut aagey haen
usko insaan samjhae aur usko devi naa banaye

पलाश ने कहा…

गम्भीरता त्याग विश्वास का विचार होती है बेटी
कभी निरर्थक जीवन को आधार देती है बेटी
ईश्वर की आदि शक्ति का भंडार होती है बेटी
कभी धरा पर सीता कभी सावित्री बनती है बेटी
जब सीता राधा रानी के गुण की खान बनती है बेटी
तब दुनिया मे एक नेक इन्सान बनती है बेटी

वन्दना ने कहा…

वाह वाह्………………बेहद सुन्दर अभिव्यक्ति।

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

कई जनम के सत्कर्मो का
जब मुझको वरदान मिला
परमेश्वर से तब मैंने
सीता सी बेटी मांग लिया

''बेटी मांग लिया'' शायद व्याकरण की दृष्टी से गलत हो
पर भाव बहुत अच्छे हैं .....सत्कर्मों के बदले बेटी माँगना ....बहुत सुंदर.....!!

Divya ने कहा…

The poem is reflecting the beautiful thinking of the Poet.

Thanks for this beautiful creation. We need more people to value and honor the daughters of India.

past life therapy ने कहा…

myself proud to be father of my daughter

बेनामी ने कहा…

मेरे जीवन के आँगन में खेलती मेरी लली,मेरी स्नेहिल बगिया की फूलों की डली

Neel Shukla ने कहा…

BAHUT HI ACCHI AUR NAI SOCH HAI AAPKI.........

GUDIYA TO BAHUT HI SUNDAR HAI...
SACH SUNDAR ABHIVYAKTI APKI...HAI SIR JI........

बेनामी ने कहा…

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