सोमवार, 28 जून 2010

मौन निमंत्रण मेरा.........


मधुवन को भीनी खुशबू से
महकाए जब रजनीगंधा
अम्बर में तारो संग संग
इतराए इठलाये चंदा
मुसकाते बलखाते झरने
लगे सुनाने गीत सुहाने
उनकी धुन पर ढलकी जाए
लोरी गाये जब संझा
मौन निमंत्रण मेरा प्रियतम
आ जाओ बन आनंदा


दीप बुझे जब जग के सारे
मन में दीप जलाना तुम
बुलबुल गीत सुनाती है तब
हौले से कदम बढ़ाना तुम
चौकड़िया भरते मृगशावक
राह दिखायेगे तुमको
मेरी बंशी की धुन
मेरा पता बताएगी तुमको
मधुर रागिनी सुनकर आली
आना तुम बन वृंदा
मौन निमंत्रण मेरा प्रियतम
आ जाओ बन आनंदा






9 टिप्‍पणियां:

वन्दना ने कहा…

sundar rachana.

माधव ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता , मजा आ गया पढ़कर

Dr KIRAN ने कहा…

रूमानी एहसास

Udan Tashtari ने कहा…

सुन्दर प्रवाहमय गीत!!

पलाश ने कहा…

ahasaaso ko sabdon mai pirone ka esa sunder tarika wakai kabil-e-tarif hai

sanu shukla ने कहा…

umda rachna..

Harshkant tripathi ने कहा…

शानदार शब्द चयन और तुकबंदी. बहुत अच्छी लगी यह पोस्ट. जमे रहिये पछुआ पवन के साथ.

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

यह मेरा वह गीत है जो मैंने सर्वप्रथम लिखा था आप सब की टिप्पड़ियो से लिखना सार्थक हुआ .

Paramanand Gupta ने कहा…

sir आपने तो काफी अच्छा लिखा