सोमवार, 27 दिसंबर 2010

और ज़िन्दगी नए पड़ाव तय करती है.

तुम जलती हो ,
जो धूप मै देता हूँ.
तुम भीगती हो,
जो पानी मै उडेलता हूँ.
तुम कांपती हो,
जो शीत मै फैलाता  हूँ.
सबकुछ समेटती हो,
जो मै बिखेरता हूँ.
तुम सहती हो
बिना किसी शिकायत के

मेरी धरती,
तुम रचती हो,
सृष्टि गढ़ती हो
और मै तुम्हारा आकाश
तुम्हे बाहों में भरे हुए
चकित सा देखता रहता हूँ
तुम हंसती  हो
निश्छल हंसती  जाती हो
हवाए महक जाती है
रुका समय चल पड़ता है
और ज़िन्दगी नए पड़ाव
तय करती है.

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

तात ये सोने का पदक मै कर रहा हूँ तुमको अर्पण

मेरे  पिताजी कानपुर में नौकरी करते थे. मेरी शुरुआती शिक्षा जौनपुर में ही हुई थी. मेरे ताउजी जो मेरी पहली पाठशाला  मार्गदर्शक माँ पिता गुरु मित्र सभी कुछ  रहे. तकरीबन मेरे सारे सवालों के जवाब उनके पास रहते. वो अक्सर मुझे टोपर विद्यार्थियों की बाते बताते. एक दिन मैंने उनसे पूछा कि आप तो दर्ज़ा दो तक की पढाए किये है आपको लगता नहीं कि आप भी टापर होते. उन्होंने कहा था  जिस दिन तेरे गले में स्वर्णपदक  पड़ेगा उसी दिन मै सब कुछ टाप कर जाउंगा. मै रात में सपना देखता कि मेरे गले में गोल्ड मेडल है और ताउजी कि आँखों में मेरे लिए आह्लाद का भाव.
मुझे १९ अक्टूबर  २००४ का दिन अभी भी बखूबी याद है. परास्नातक में मैंने यूनिवर्सिटी  टॉप किया था.
किरण ताउजी को लेकर पहली पंक्ति में बैठी थी. बार बार उदघोशक महोदय बता रहे थे कि परास्नातक में यूनवर्सिटी में सर्वोच्च अंक प्राप्त करने वाले पवन कुमार मिश्र को स्वर्णपदक  दिया जाने वाला है. ताउजी कि आँखों में  वही सपने वाले  आंसू झिलमिल कर रहे थे. मै उनके दिल से
निकले आशीषो की बारिश में खुद को भीगते देख रहा था.


(कानपुर यूनिवर्सिटी के वी.सी. प्रो एस.एस. कटियार नगरप्रमुख श्री अनिल शर्मा  और केन्द्रीय गृहराज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल  जी,  दीक्षांत समारोह के दौरान) 




मांस के लोथड़े को
तुमने इंसान में परिवर्तित किया
रक्त बनकर मेरी नसों में
मुझे गतिमान किया 
नीति कला दर्शन और जीवन का कर्मयुद्ध
ज्ञान का बोध तुम्ही से हुआ मेरे महाबुद्ध 
मेरी नन्ही उंगलियों को पकड़कर
जमीन पे "क" लिख दिया था.
वही पर  ऐ तात मेरे
प्रात मुझको दिख गया था
कभी पिता का अनुशासन  
कभी माँ क़ा दुलार बने
इतने विस्तृत थे कि जिसमे
मेरा सारा संसार बने
तुम्हारे गले में बाहे डालकर
मै झूलता था मगन होकर 
आज तुम्हारे दिल की ख्वाइश
पूरी करता हिचकिचा कर
तात ये  पदक सोने क़ा  मै 
कर रहा हूँ तुमको अर्पण 










रविवार, 19 दिसंबर 2010

और कोई भी बुलबुल अब गाती नहीं है........













याद है उस दिन इसी जगह
जीभर के हमने देखा था
संध्या को अंगड़ाई लेते
इक टहनी पर चाँद टंगा था

तुम्हारे जूडे में मैंने वो
चाँद तोड़कर टांक दिया था
और अधखिले  बेला की
गीली वेणी से बाँध दिया था

सारी रात मोगरे पर
मधुर  चांदनी झरती रही
और पेड़ की फुनगी पर
बुलबुल पंचम में  गाती रही

आज फिर उसी पेड़ के पास
उसी टहनी के नीचे आया  हूँ
लेकिन चाँद गुम है और
मोगरा कुम्हलाया देख रहा हूँ       

कुछ बेला की सूखी पंखुरी
अभी भी  धरती पर बिखरी  है
और कोई भी बुलबुल अब
प्रीत के गीत  नहीं गाती  है

और कोई भी बुलबुल अब
प्रीत के गीत  नहीं गाती  है........

शनिवार, 18 दिसंबर 2010

आये है जीने के लिए या मृत्यु के लिए जीते है

प्रत्येक बार अंतरात्मा जन्म लेता और प्रत्येक बार सांसारिक पदार्थो से मन प्राण और शरीर की रचना होती है. यह रचना भूतकाल के विकास और उसके भविष्य की आवश्यकता के अनुसार होती है. इसी बात को लेकर मन में कुछ घुमड़ रहा था, सोचा आपसे भी चर्चा करू. सुझावों व टिप्पणियों का हार्दिक स्वागत है












मेरे से इतर क्या संभव है
वह परिभाषा जो मै होती है
मै सृष्टि की रचना हूँ
या सृष्टि मुझमे ही बनती है

विराट में निहित एक बिंदु
या विराट बन गया बिंदु
सागर में बूँद समाई है
या बूँद में बसे महासिन्धु

आये है जीने के लिए
या मृत्यु के लिए जीते है
कही मृत्यु तो वही नहीं
हम जिसको जीवन कहते है.


.................... सुधी पाठको के उत्तर की प्रतीक्षा में

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

राम कहानी..........
















इस दुनिया में सबकी
अपनी राम कहानी है,
कही छलकते पैमाने है
 कही आँख का पानी है।

चौथेपन में सत्ता का रस
 छक कर मतवाले पीते है,
गिरती पड़ती ठोकर खाती
 घायल नयी जवानी है।

पढ़े लिखो की दुनिया में
 अनपढ़ का गुजारा कैसे हो,
गले लगा कर गला दबाना
 आदत बहुत पुरानी है।

रातो को नींद नहीं आती
दिन भर घबराया रहता ,
हाथ आज खाली खाली औ'
 बिटिया हुयी सयानी है।

रविवार, 12 दिसंबर 2010

और अफज़लो की सजा बदल रही है.











महबूब-ए-मुल्क की हवा बदल रही है,
ताजीरात-ए-हिंद की दफा बदल रही है.

अस्मत लुटी अवाम की कहकहो के साथ,
और अफज़लो की सजा बदल रही है.

बारूदी बू आ रही है नर्म हवाओ में,
कोयल की भी मीठी ज़बा बदल रही है.

सुबह की हवाखोरी भी हुई मुश्किल,
जलते हुए टायर से सबा बदल रही है.

सियासत ने हर पाक को नापाक कर दिया,
पंडित की पूजा मुल्ला की अजां बदल रही है.

कहने को वह दिल हमी से लगाए है,
मगर मुहब्बत की वजा बदल रही है.

दुआ करो चमन की हिफाजत के वास्ते,
बागबानो की अब रजा बदल रही है।

निगहबानी करना बच्चो की ऐ खुदा,
दहशत में मेरे शहर की फ़ज़ा बदल रही है.

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

भूली बिसरी सुधियों के संग एक कहानी हो जाये














भूली बिसरी सुधियों के संग एक कहानी हो जाये,
तुम आ जाओ पास में मेरे  तो रुत रूमानी हो जाये।

मन अकुलाने लगता है चंदा की तरुनाई से,
रजनीगंधा बन जाओ तो रात सुहानी हो जाये।

रेशम होती हुई हवाए तन से लिपटी जाती है,
पुरवाई में बस जाओ तो प्रीत सयानी हो जाये।

मन बधने सा लगता है अभिलाषाओ के आँचल में,
प्रिय तुम प्रहरी बन जाओ थोड़ी मनमानी हो जाये।

बुधवार, 8 दिसंबर 2010

जो मंगल गीत बना उसको निश्चित मातम बन जाना है.











अनमोल पलों को खोकर हम

कुछ नश्वर चीजे पाते है
और उस पर मान जताते है
यह अभिमान क्षणिक  है बंधू
समय का कौन ठिकाना है
जो मंगल गीत बना उसको
निश्चित मातम बन जाना है.


घनघोर घटाए आती है
पल भर में प्रलय मचाती है
लेकिन अगले ही क्षण उनको
अपना अस्तित्व मिटाना है.

जैसे सागर की लहरे
तट पर आती मिट जाती है
इस धरती पर सबको वैसे
आना फिर मिट जाना है.

जो आज हमारा अपना है
कल और किसी का होगा वह
सारे जग की यही रीत है
उस पर क्या पछताना है.

जग ठगता है हर पल पग पग
क्यों रोते हो ऐसा कह कर
देकर धोखा अपने तन को
एक दिन तुमको भी जाना है....

शनिवार, 4 दिसंबर 2010

'कौवे' ने फिर काँव काँव किया बड़े दिनों के बाद.

अरे!

'कौवे' ने फिर काँव काँव किया  बड़े दिनों के बाद
कोयल के घोंसले को अपना बताना कौवों का जगजात फितूर है.
जनाब जमाल साहब मै ये नहीं चाहता था पर ना लिखना मुनासिब ना समझा.
आप कैसे विद्वान है जो सवाल को बदगुमानियत का दर्ज़ा देते है.
एक किस्सा सुनाये आपको..
चिडयाघर में एक चुटकुले पर दो घोड़े हस रहे थे गधा चुप था चौथे या पाचवे दिन गधा एकाएक हसने लगा तो पहले घोड़े ने दूसरे से पूछा कि आज बिना बात के यह गधा क्यों हस रहा है तो गधे ने खुद जवाब पोस्ट किया कि मुझे चुटकुला आज जा कर समझ में आया.
इतने दिन बाद अपर्णा जी  के कम्मेंट पर पोस्ट लिखने का सबब क्या है?
मुझे मालूम है कि अभी पूरा गिरोह चाव चाव करेगा एक नहीं दस दस कमेन्ट मुझ पर किये जायेगे
जमाल साहब 'अजीत' के अंदाज में मुह में राम बगल में छुरी रखकर प्यारी बाते कहेगे.
.....और भास्कर जी क्या कहे आपको आप भी इरादा नहीं समझ पाते.
जनाब जमाल अब आप अपने इरादे जरा स्पष्ट शब्दों में बता दे.
हां या नहीं में जवाब दे (केवल हा या नहीं )
१. सम्पूर्ण भारत इसलाम का अनुयायी बन जाय
२. आपने एक बार टिप्पणी की थी कि ओबामा की दादी को सम्पूर्ण विश्व के लिए यही दुआ मांगनी चाहिए.(शायद तौसीफ जी की पोस्ट थी जिसमे ओबामा की दादी चाहती थी की ओबामा इसलाम कबूल करले). आपकी दिली इच्छा पूरे विश्व को इसलाममय देखने की है.
३. ईश्वर ही अल्लाह का पर्याय है.
एक बात मै आपको स्पष्ट कर दू और आपके पूरे गिरोह को कि 'अल्लोप्निषद' या 'भविष्यपुराण' अकबर के समय में रचे गए है. ये 'ओरिएन्तेद' रचनाये है जिनका प्रयोग आप जैसे विद्वान ही कर सकते है.
सुधी पाठक गण नीचे लिंक को पढ़कर जमाल जी के विचार देखे और अपर्णा जी के कमेंट्स फिर उसमे क्या बद्गुमानियत है बताये.

http://vedquran.blogspot.com/2010/03/blog-post.html
Monday, March 1, 2010 कौन कहता है कि ईश्‍वर अल्लाह एक हैं

आम तौर पर लोग यह समझते हैं कि गांधी जी ने बताया है ‘‘ ईश्‍वर अल्लाह तेरो नाम सबको सन्मति दे भगवान ‘‘ या फिर लोग कहते हैं कि साईं बाबा ने कहा है कि
सबका मालिक एक
और अल्लाह मालिक
लेकिन हकीक़त कुछ और है...हकीकत क्या है? बताओगे ?
वैदिक साहित्य तो इसका उद्घोश तब से कर रहे हैं जब मुसलमान भारत में आये भी नहीं थे ।

अल्लोपनिषद इसी महान सत्य का उद्घोश है ।भारत की हिन्दू मुस्लिम समस्या के खात्मे के लिए भी यह अकेला उपनिषद काफ़ी है और भारत को विश्‍व गुरू बनाने के लिए भी ।
अल्लो ज्येष्‍ठं श्रेष्‍ठं परमं पूर्ण ब्रहमाणं अल्लाम् ।। 2 ।।
अल्लो रसूल महामद रकबरस्य अल्लो अल्लाम् ।। 3 ।।
अर्थात ’’ अल्लाह सबसे बड़ा , सबसे बेहतर , सबसे ज़्यादा पूर्ण और सबसे ज़्यादा पवित्र है । मुहम्मद अल्लाह के श्रेष्‍ठतर रसूल हैं । अल्लाह आदि अन्त और सारे संसार का पालनहार है । (अल्लोपनिषद 2,3)
इस पर अपर्णा जी की टिप्पणी  है......
'आप जिस उपनिषद की बात कर रहे है , कृपया उसके रचयिता का नम भी बता दीजिये ।
और रही बात ईशवर और अल्लाह के अलग होने की , तो हो सकता है आप ने दोनो को साक्षात अलग अलग देखा हो , और यह आपका परम सौभाग्य रहा होगा ।
हो सकता है । आपका प्रयास सफल हो हम तो यही दुआ करते है । आप अपने जीवन में अपने धर्म को श्रेष्ठ बताने में सफल हो जायें क्योकिं हमे तो इसकी तनिक भी जरूरत नही। हम सूरज को आइना नही दिखाते । क्या नवीन है और क्या पुरातन शायद यह जानने के लिये आपको अभी और अध्धययन की आवश्यकता है ।'

यहाँ मै अपने सुधी पाठकों को एक बात और बताना चाहूँगा कि मैने बृहस्पतिवार, ११ नवम्बर २०१० को जमाल साहब को एक पत्र लिखा था एक पत्र-पुष्प अनवर जमाल के नाम 

आज तक जमाल साहब तक शायद यह पत्र पहुँचा ही नही या वह अभी जवाब लिख ही रहे है ? जो भी हो अभी तक हमारा इंतजार जारी है

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

ऋषि कलाम: मेरे हीरो

'कलाम' शब्द की ऊर्जता से  मै अपनी चेतना के प्रारंभिक दिनों से ऊर्जित होता आया हूँ. यह शब्द मुझे गीता के श्लोक  और कुरआन की आयतों की तरह पवित्र और आह्लादकारी लगता है. मै कलाम साहब  लिए 'ऋषि' शब्द का प्रयोग करता हूँ. मुझे मार्गदर्शन देते हुए मेरे हीरो अव्यक्त रूप में हमेशा मेरे पास रहते है. मै इन पर ज्यादा कुछ लिख नहीं पाऊंगा. लेखन से परे का शब्द है 'कलाम'. मै इस समय गुड खाने वाले गूंगे के सरीखा हूँ जो मिठास बता नहीं पायेगा.  लेखनी अपने आप डोली है जिसे नीचे पिरो दिया है.

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आप मिसाइल मैन है या
एक मिसाल ,
जो हम जैसो के लिए बन गए है।
लेकिन,
आपकी सटीक परिभाषा दूंगा
एक मशाल के रूप में ।
आपने ता-उम्र जलकर
रोशनी दी है
सौ करोड़ से अधिक आत्माओं के लिए
आप बनगए है
अक्षय ऊर्जा स्रोत।
आपकी रहस्यमयी मुसकान
मुझे चुनौती देती है
और प्रेरित करती है
'दिया' बन जाने को
हताशा के अँधेरे में ,
और
भय की ठिठुरन में
'अग्नि' बन जाने को।
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बुधवार, 1 दिसंबर 2010

किन्तु मुझको है भरोसा, आओगी तुम मुस्कराकर.











बीता रात का तीसरा पहर
तुम नहीं आये
आधा हुआ चंदा पिघलकर
तुम नहीं आये

मै अकेला हूँ यहाँ पर
यादो की चादर ओढ़कर
रात भर पीता रहा
ओस में चांदनी घोलकर

फूल खिले है ताजे या तुम
अपने होठ भिगोये हो
हवा हुयी है गीली सी क्यों
शायद तुम भी रोये हो

अब सही जाती नहीं प्रिय
एक पल की भी जुदाई
देखकर बैठा अकेला
मुझ पे हसती है जुन्हाई

बुलबुलें भी उड़ गयी है
रात सारी गीत गाकर
किन्तु मुझको है भरोसा
आओगी तुम मुस्कराकर.

किन्तु मुझको है भरोसा
आओगी तुम मुस्कराकर.

बूँद आख़िरी ख़त्म हुयी होंठो पर प्यास रही बाकी





















बूँद आख़िरी ख़त्म हुयी होंठो पर प्यास रही बाकी,
बंद हुए सब मयखाने पीने की आस रही बाकी.

सैय्यादो की बस्ती में पंछी किससे फ़रियाद करे,
फरमान मौत का सुना दिया इलज़ाम लगाना है बाकी.

कालिख भरी कोठरी से बेदाग़ गुज़रना मुश्किल है,
अब तक कोरे दामन पर तोहमत का लगना है बाकी.

दावा है उनका पहुचेगे इक दिन चाँद सितारों तक,
लेकिन पहले वह तय करलो जो दिलो में दूरी है बाकी.

पूरब में उड़ाती हुयी घटाओ  इक दिन मेरे घर आना,
बीत गए सावन कितने पर मेरा आँगन है बाकी.

बूँद आख़िरी ख़त्म हुयी होंठो पर प्यास रही बाकी,
बंद हुए सब मयखाने पीने की आस रही बाकी.

सोमवार, 29 नवंबर 2010

तुम्ही से रूठना तुमको मनाना अच्छा लगता है













अकेले में तुम्हारी याद आना
अच्छा लगता है,
तुम्ही से रूठना तुमको मनाना
अच्छा लगता है।

धुन्धलकी शाम जब मुंडेर से
पर्दा गिराती है,
सुहानी रात अपनी लट बिखेरे,
पास आती है,
तुम्हारा चाँद सा यूँ छत पे आना,
अच्छा लगता है।

फिजाओं में घुली रेशम नशीला
हो रहा मौसम,
ओढ़कर फूल का चादर सिमटती
जा रही शबनम,
हौले से तुम्हारा गुनगुनाना
अच्छा लगता है।

अकेली बाग़ में बुलबुल बिलखती है
सुलगती है,
रूमानी चांदनी मुझपर घटा बनकर
पिघलती है,
तुम्हारा पास आना मुसकराना
अच्छा लगता है

अकेले में तुम्हारी याद आना
अच्छा लगता है।

शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

इंसान की मुकम्मिल पहचान मेरे राम।



















मुल्क की उम्मीद-ओ -अरमान मेरे राम,
इंसान की मुकम्मिल पहचान मेरे राम।

शिवाला की आरती के प्रान मेरे राम,
रमजान की अज़ान के भगवान् मेरे राम।

काशी काबा और चारो धाम मेरे राम,
ज़मीन पे अल्लाह का इक नाम मेरे राम।

दर्द खुद लिया दिया मुसकान मेरे राम,
ज़हान में मुहब्बते -फरमान मेरे राम।

रहमत के फ़रिश्ते रहमान मेरे राम,
सौ बार जाऊ तुझ पर कुरबान मेरे राम।

हर करम पे रखे ईमान मेरे राम,
तारीख में है आफताब नाम मेरे राम।

वतन में मुश्किलों का तूफ़ान मेरे राम,
फिर से पुकारता है हिन्दुस्तान मेरे राम।

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

'काफ़िर है वो जो कायल नहीं इसलाम के'

एक प्यारी सी  बात
'काफ़िर है वो जो कायल नहीं इसलाम के'

दूसरी  प्यारी बात
'लाम* के मानिंद  है गेसू** मेरे घनश्याम के,
 काफ़िर है वो जो कायल नही इसलाम के'

==============================
* उर्दू में लाम  ل   के आकार का होता है कृष्ण के बाल** भी इसी तरह मुड़े हुए थे.

मंगलवार, 23 नवंबर 2010

मुझको तुम आवाज ना देना...







मुझको तुम आवाज ना देना
पलक भिगो कर नहीं देखना
मै आवारा बादल हूँ तुम
मुझे देवता मत कहना

अपना ही नहीं है ठौर कोई
बेबस करता है और कोई
हवा ने बंदी बना लिया तुम
मेरी बंदिनी मत बनना

सपनो से बसा संसार कभी
मत कहना इसको प्यार कभी
विपरीत दिशाए है अपनी
तुम मेरी संगिनी मत बनना

कल परसों में  है मिटना
कैसे कह दू तुमको अपना
अंतिम यही नियति मेरी
इसे प्रेम तुम मत कहना

सोमवार, 22 नवंबर 2010

सीख लो ...



















पतझड़ो के मौसम में मुस्कराना सीख लो 
हँसते हुए जहान को अपना बनाना सीख लो


फूल अगर मीत है तो कांटे भी गैर नहीं
हर किसी को अपने दिल से लगाना सीख लो


कुछ सुनाओ, गुनगुनाओ ये खामोशी ठीक नहीं
बुलबुल के पास जाकर कोई गीत गाना सीख लो


चाँद नहीं रात में तो रंज किस बात का
अमावास में धरती को जगमगाना सीख लो


सौ बार जनम लेने से इक दोस्त मिलता है
दोस्ती को जनम जनम तक निभाना सीख लो


'वो' रूठते है तुमपे अपना हक जमाने के लिए
रूठे हुए महबूब को फिर से  मनाना सीख लो

रविवार, 21 नवंबर 2010

जड़ता की ओर बढ़ते कदम; रक्तदान और अंगदान करना हराम

दारुल उलूम देवबंद ने एक  (अमर उजाला काम्पैक्ट २१नवम्बर पृष्ठ 20) फतवा जारी करके रक्तदान और अंगदान को हराम घोषित किया है. हालांकि उसमे यह भी जोड़ा कि करीबी रिश्तेदारों को खून दिया जा सकता है.आगे यह भी है कि कोई इंसान यदि अपनी उंगली काटे या खुद को गोली मारे तो वह गुनाह गार है क्योकि शरीर अल्लाह का दिया हुआ है और इंसान इसका मालिक नहीं है. दारुल उलूम देवबंद के दारुल इफ्ता के मुफ्ती जैनुल इस्लाम ने कहा कि जो चीज़ इंसान कि नहीं है उसे किसी दूसरे को देने का हक नहीं है.
अब मेरा प्रश्न है....
१.धरती पर कोई भी चीज़ इंसान की नहीं है फिर उनका इस्तेमाल करके सारे इंसान अल्लाह के विरुद्ध कार्य करते है ?
२. खुद की उंगली काटे तो हरामी, और जानवर जबह करे तो कुर्बानी ये दोगलापन क्यों? क्या जानवर इंसान ने बनाये है?
३. करीबी रिश्तेदार को खून दिया जा सकता है. जब  इस्लाम के अनुसार सारे मुसलमान आपस में भाईचारे से बंधे है तो करीबी कौन या दूर का कौन?   अपना मर रहा है खून चढ़ा दो गैर मरे तो मरने दो. वाह....... क्या भाव है?
४.दोगलेपन की हदे तोड़ता हुआ फतवा जड़ता और अज्ञानता के गहरे अँधेरे में अपने लोगो को धकेले के अतिरिक्त और कितना उपयोगी होगा ?

शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं..

मै बहन अपर्णा से क्षमा मंगाते हुए इस पोस्ट को लिखने जा रहा हूँ. वैसे मै तो चाँद पर जाना चाहता हूँ. क्यों? क्योकि यहाँ आग लगी है. लेकिन भागना ही नहीं आया . यही रहूगा और अपनी धरती अपना देश को बुरी नज़र से बचाने का काम करूगा.शुरुआत इस ब्लॉग जगत से करता हूँ या कर दिया हूँ. समाजशास्त्री  होने के कारण व्यक्ति के व्यवहारों के पीछे छिपे कारणों को मै जान सकता हूँ. कोई व्यक्ति दो तरीके से सोचता है. प्रथम मूल प्रवृत्तियों द्वारा और दूसरा सीखा हुआ. हम सीखने के दौरान गलतिया  करते है फिर सुधारते   है. लेकिन जन्मजात प्रवृत्तियों में सुधार की गुन्जाईस होना गधे के सर पर सीग उगने जैसा  है.
गलतियों और सुधार पर कुछ श्रेणिया बनी है.........
जो गलती छोड़ कर बैठा उसे भगवान कहते है
समझता जो ना गलती को उसे हैवान कहते है
सुधरता कर जो गलती को उसे इंसान कहते है
करे गलती पे जो गलती उसे शैतान कहते है.
मै एक बात स्पष्ट  कर दू कि यह मामला व्यक्तिगत है रीति-रिवाजो और परम्पराओं धार्मिक मसले सीखे हुए व्यवहार के अंतर्गत नहीं आते वरन लादे गए होते है. मनुष्य अपने विवेक के अनुसार उसमे आवश्यक सुधार कर अपनाता है.
ये तो रही सैद्धांतिक बात.
अब व्यवहारिक बात की जाए
इस ब्लॉग जगत में तमाम ऐसे लोग आ गए है. जो पहली कटेगरी के है. ये बजबजाती  नाली के वे  बिलबिलाते कीड़े है जो यह समझते है कि सम्पूर्ण विश्व के आनंद और ज्ञान का स्रोत एकमात्र बजबजाती नाली है. ये गन्दगी में लोटते सूअर सरीखे लोग सारे दुनिया को गंदा करे उसे अपने जैसा बनाना चाहते है.  जैविकीय हस्तांतरण और समजीकीय हस्तांतरण तो प्राप्त करते है किन्तु बिना विवेक के. यही विवेक हैवान  और इंसान में भेद करता है. 
मेरा समस्त(सूअर बुद्धि वालो को छोड़ कर क्योकि इनको कुछ सिखाया या समझाया नहीं जा सकता है ) ब्लोगर्स से अनुरोध है कि वे इन नाली के कीड़ो और गन्दगी के सुअरों का बहिष्कार करे.
पाठक गण इनके बारे में अच्छी तरह से जानते है
अंत में दुष्यंत कुमार जी के शब्दों में....

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए


सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

बुधवार, 17 नवंबर 2010

महीना दिसम्बर हुआ










कोहरे का घूंघट ,
हौले से उतार कर ।
चम्पई फूलों से ,
रूप का सिंगार कर ॥

अम्बर ने प्यार से   ,
धरती को जब छुआ ।
बरफीली ठंडक लिये ,
महीना दिसम्बर हुआ ॥

धूप गुनगुनाने लगी ,
शीत मुस्कुराने लगी ।
मौसम की ये खुमारी ,
मन को अकुलाने लगी ॥

आग का मीठापन जब ,
गुड से भीना हुआ ।
बरफीली ठंडक लिये ,
महीना दिसम्बर हुआ ॥

हवायें हुयी संदली ,
चाँद हुआ शबनमी ।
मोरपंख सिमट गये ,
प्रीत हुयी रेशमी ।।

बातों-बातों मे जब ,
दिन कही गुम हुआ ।
बरफीली ठंडक लिये ,
महीना दिसम्बर हुआ ॥

रविवार, 14 नवंबर 2010

मै अक्सर कल्पना करता हूँ कि ...

मेरी पिछली दो पोस्टो को पढने के बाद मेरी बहन अपर्णा ने मुझसे कहा कि गधो को अच्छा सबक मिल गया है . अब गदहपचीसी छोड़ कर ऐसी रचनाओं का सृजन करो जिनको पढने के बाद मन में सकारात्मकता के  आनंद के भाव उठे. वैसे ही इस दुनिया में लड़ाई झगडे की भरमार है. मैंने उससे कहा, भद्रे! मै खुद नहीं चाहता कि मुझे किसी से तकरार करनी पड़े किन्तु जब कोई  व्यवस्था को बिगाड़ने की बात करता है तो उनको सही रास्ते पर ले आना कर्तव्य बन जाता है.

बहरहाल मै  सुधी पाठको को जमालो और शर्माओं की दुनिया से दूर ऐसी जगह ले चलता हूँ जिसकी मै अक्सर कल्पना करता हूँ.
कुछ झलकिया देखिये.....

सावन भादों जल बरसेगे
नदियों के तट मिल जायेगे
वो भी दिन आएगा जब
धरती फिर से मुस्कायेगी

रिश्तों की बरफ पिघल जायेगी
बिछड़े दिल मिल जायेगे
टूटे बंधन को जुड़ना होगा
तुलसी के दीप  जल जायेगे

दूर प्रदूषण होगा जीवन से 
तन से मन से घर आँगन से
यमुना का जहर मिटेगा इक दिन
गंगा पावन हो जायेगी

शरदपूर्णिमा का  चन्दा
धरती पर मधु बरसायेगा  
किसी की पैजनिया खनकेगी
किसी की मुरली गायेगी

मीठी अमराई महकेगी
सुबह शाम पंछी  चहकेगे
पायल छनकाती सखियों के संग
पनघट पर गोरी आयेगी

वो भी दिन आएगा जब
धरती फिर से मुस्कायेगी....

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

एक पत्र-पुष्प अनवर जमाल के नाम



http://pachhuapawan.blogspot.com/2010/11/blog-post_11.html
अनवर जमाल साहब आप की भाषा उतनी ही बढ़िया है जितनी पुरानी फिल्मो में एक अभिनेता थे 'अजीत'. जो बड़े प्रेम से कहते थे 'इसको हैमलाक पिला दो आसानी से मर जाएगा'.रही बात अक्ल के अंधे की तो यह कोई बुरा शब्द नहीं है. लगता है आप जहा से पढ़े है वहा मुहावरे वगैरह नहीं पढाये जाते थे. अक्ल का अँधा अल्प ज्ञानी को कहते है. सत्य को अपने हितो के आधार पर परिभाषित करना अल्पज्ञान ही कहलाता है.रही बात की आपने मुझे अपना भाई कहा तो क्षमा चाहूगा क्योकि आप तो पूरी शिद्दत से सबको 'अपना' बनने में जुटे ही है. जमाल साहब कभी किसी के बन कर तो देखिये. मैने आपके लिए तुम शब्द का प्रयोग किया था. तुम अनौपचारिक शब्द होता है किसी निकट के व्यक्ति को संबोधित करने इस शब्द का प्रयोग होता है. लेकिन मैंने ये मिस्टेक सुधार ली . आप की कमी तो मै बताना नहीं चाहता क्योकि आपको मै तथाकथित मर्मज्ञों की श्रेणी में रखा पाया था किन्तु आपने इस बात को पूछ कर मेरे उस भ्रम को तोड़ दिया. आभार. पहली बात, आप कभी कानपुर आये है कभी बेकन गंज और हबूदा अहाते में गए है अगर नहीं तो आइयेगा . भूख से बिलबिलाते बच्चे आपका अभिनन्दन करेगे. कोई भी व्यक्ति चिल्ला कर यह कहे को इस्लाम का या हिन्दू धर्म का पक्का हिमायती है. मै उसे नहीं मानता धर्म की पहचान व्यक्ति के कर्म से होती है. दूसरी बात की आप कहते है सनातन धर्म( अन्य भी ) कल की बात थी इस्लाम आज की बात है. इसका क्या मतलब है ? जो और धर्म के अनुयायी है परोक्ष रूप से या वास्तविक रूप से इस्लाम के ही अनुयायी है. ऐसा कह कर आप क्या जताना चाहते है ? आपके कहने का मतलब इस्लाम को छोड़ कर सारे धर्म कल की बाते हो गए है. मै इस्लाम का उतना ही सम्मान करता हूँ जितना के स्वधर्म का. किन्तु यह बात मुझे कतई बर्दाश्त नहीं है की किसी धर्म को दूसरे धर्म ऊपर रख कर वाह वही लूटी जाय.

आपके  लिंक मैंने देखे. एक बात समझ लीजिये जादू कभी धर्म नहीं होता.

सनातन धर्म और दयानंद के बारे में कुछ कहने से पहले 'शाश्त्रार्थ परंपरा' के बारे में जानिये.

और अंत में में आपने पूछा की मै किस दुनिया में रहता हूँ तो मै आपको बताता चलू कि कम से कम मै आपकी दुनिया में तो नहीं रहता.

हिन्दू कहे मोहे राम पियारा तुरक कहे रहिमाना
आपस में दोउ लड़ी मुए मर्म ना कहू जाना

कबीर दास जी को अपने करीब लाये तो कुछ ज्ञान चक्षु खुले आपके

दयालु अल्लाह आपको स्वस्थ और सानंद रखे.

आमीन

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

बी. एन. शर्मा और अनवर जमाल की गदहपचीसी

'दंभिन निज मत कल्प करी प्रगट  किये बहु पंथ' आज से सैकड़ो साल पहले लिखी इस पंक्ति सार्थकता मुझे तब दिखी जब तथाकथित धर्म मर्मज्ञों के ब्लॉग पर आना हुआ. कहने की जरूरत नहीं है कि ये मर्मज्ञ द्वय कौन है. अभी बूझ नहीं पाए तो बताते चले ये स्वनामधन्य बी. एन शर्मा और अनवर जमाल है. जो दावा करते है कि उनके मतानुसार की गयी व्याख्याए ही संसार के अंतिम सत्य है.
बी. एन शर्मा बहुत ही अनर्गल और अश्लील शब्दों में इस्लामिक धर्मग्रथो के बारे में  लोगो को बताने में लगे है. और उनको मिल रही बेनामी टिप्पड़ियो  को देखा जय तो यह प्रतीत होता है कि इसमें से आधी टिप्पणी तो स्वयं शर्मा की है बाकी उन लोगो की है जो कुकर्म  करने की इच्छा मन में दबाये हुए है  किन्तु माहौल नहीं बन रहा है. शर्मा कि तरफ से एक मंच मिलने से ये लोग अपनी भड़ास निकालने में लगे है. तुलसीदास जी का कथन है
जो कह झूठ मसखरी जाना। कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना।। तो इस्लामिक मामलो की मसखरी बनाकर शर्मा गुनवंत बनने चले है.ऐसे लोगो ने हिन्दू धर्म को नुकसान पहुचाने के अलावा और कोई योगदान नहीं दिया है. ये घृणा के अग्रणी ध्वजवाहक है जो कीड़ो और सियारों की बजे मानव के रूप में इस धरती पर टपक पड़े. शर्मा कुछ शर्म करके अपने परिवार मोहल्ले और गाव ये शहर जहा रहते हो वहा की कमियों को पहचानो  और दूर करने का प्रयास करो तो परलोक सुधर जाएगा नहीं तो  प्रारब्ध  के पुण्य समाप्त होते ही रौरव नरक के दर्शन होगे.
अनवर जमाल दूसरे मर्मज्ञ है जो दावा करते है कि वैदिक धर्म का लेटेस्ट वर्जन इस्लाम है. अब जरा जमाल बाबू की चतुराई देखो सनातन धर्म की थोड़ी सी तारीफ  करके पूरे सनातनियो को हिन्दुओ को परोक्ष रूप से मुसलमान बता रहे है. इन्होने उद्विकास के सिद्धांत का सहारा लिया है क्यों ना ले आखिर डाक्टर साहब का ज्ञान गजनवी और औरंगज़ेबों की परंपरा बढ़ने में सहायक नहीं होगी तो ये अपने आकाओं को क्या मुह दिखायेगे. जमाल ज़रा अपने गिरेबानो में झाँक कर देखो.
मुझे मालूम है नही देखोगे क्योकि ये बात तुम भी अच्छे से जानते हो तुम अपनी किसी भी किताब या मत कि पुनर्व्याख्या नहीं कर सकते यदि हिम्मत है तो किसी एक लाइन का विश्लेषण करो. सनातनी जब विद्वत्ता की पहली सीढ़ी पर चढ़ता है तो उससे भाष्य लिखने को कहा जाता है क्योकि
सनातन धर्म में सभी के मत को सामान महत्व दिया जाता है. जमाल बाबू
तुम्हारी यही जड़ता तुम्हारे पतन का कारण बनेगी.
कोई भी धर्म मनुष्य से ऊपर नहीं है. दुनिया में जो कुछ है वह इसलिए कि मानवमात्र का  अधिकतम कल्याण हो. इन अकल के अन्धो को ये नही दीखता कि जिसे ये सम्पूर्ण कहते है वो मात्र एक इकाई है 
और अंत में 
अयं निजः परोवेत्ति गणना  लघुचेतसाम
उदारचरितानाम ,वसुधैव कुटुम्बकम 
अर्थात यह मेरा है वह तेरा है  ऐसा सोचने वाले छोटी बुद्धि वाले है. उदार लोगो के लिए समस्त धरती परिवार है .

बुधवार, 3 नवंबर 2010

उसी मासूमियत पे रहनुमाई झूम जाती है

आज तक मैंने ब्लॉग पर जो कुछ भी लिखा है वह मेरी ज़िंदगी के तजुर्बे और महसूस करने पर आधारित रहा है.मैने  अपनी पोस्ट के माध्यम से अपने को उकेरने की कोशिश की है. मै इस बात को मानता हूँ कि रचना करना ही जीवन है. ब्लोगिंग के माध्यम से मै अपनी जीवन्तता बनाये रखने का प्रयास करता हूँ.इस क्रम में कदाचित दूसरो को खुशी का एक टुकड़ा भी दे पाऊ तो मेरी जीवन्तता और रचनात्मकता दोनों सार्थक प्रतीत होने लगती है. कल मेरे एक फालोवर ने पूछा कि आप कि रूमानी कविताओं की नायिका कौन है. उसके उत्तर में मै  आज आपको मै वो गीत भेट करने जा रहा हूँ जो मैंने आज से पाच साल पहले लिखा था. उस समय एक लडकी मुझे  ना जाने क्यू बहुत अच्छी लगती थी.वो जब मुझसे बात करती थी तो आसपास के लोग जाने क्यू मुझसे अजीब किस्म का व्यवहार करने लगते. शायद उसका मुझसे बात करना लोगो को अखरता था. कुमार नयन की एक ग़ज़ल के चन्द अशरार है
नज़र नीची लबों में  हो दबी मुस्कराहट तो
उसी मासूमियत पे रहनुमाई झूम जाती है
गजलसे जब तुम्हारे प्यार की खुशबू छलकती है
कसम अल्लाह की सारी खुदाई झूम जाती  है
लेकिन मेरे साथ तो उल्टा हुआ. सारी खुदाई मेरे विरुद्ध ...........
ग़ालिब बोल पड़े ये इश्क नहीं आसाँ एक आग का दरिया है और डूब के जाना है.
मैंने जो महसूस किया आप भी उससे रूबरू होइए.....
कुछ अपने छूटा करते है
कुछ शीशे टूटा करते है
बालू के बने घरोंदे तो
इक  दिन फूटा ही करते है
तारो से क्या लेना देना
यद्यपि आते है आँगन में
मेरा चाँद निकलेगा इक दिन
तारे टूटा ही करते है
हम अभिमानी निर्भय होकर
बीच राह से गुजरेगे
जब बाग़ से फूल चुराया है तो
माली रूठा ही करते है...
              आपको बता दे कि वह लडकी आज भी मेरे साथ रहती  है मेरी माँ उससे कहतीं  है.. अरे बहू जरा चाय तो बना. किरण कहती है जी मांजी .......



रविवार, 31 अक्तूबर 2010

मीठी सी लौ भर रही चारो ओर मिठास

खेतों में बागो में दियना करे उजास,

मीठी सी लौ भर रही चारो ओर मिठास.

दसो दिशाओं में घुली भीनी-भीनी गंध,
कण-कण पुलकित हो उठे लूट रहे आनंद.

नयी फसल लेकर आयी घर में गुड और धान,
लईया खील बताशों से अभिनंदित मेहमान.

गेरू गोबर माटी से लिपा पुता है गाँव,
घर से भगे दलिद्दर सर पे रखकर पाँव.



झांझ मजीरा ढोलक बाजे झूम रही चौपाल,
नाचे मन हो बावरा देकर ताल पे ताल.


फूटी मन में फुलझड़िया पूरण होगी आस,
परदेसी पिऊ आ गए गोरी ने छुआ अकास.

दीवाली ने कर दिया ज्योतिर्मय संसार,
सबके आँगन में खिले सुख समृद्धि अपार.

शुक्रवार, 29 अक्तूबर 2010

एक बार भाव से तो देख सही पगले

एक बार मै मंदिर गया
हनुमान जी का दर्शन करने,
पत्थर की प्रतिमा थी
ईंटो का महल था
यंत्रवत नगाड़े बज रहे थे
लोग सहमे खड़े थे



ट्यूबलाईट बल्ब बेहिसाब जल रहे थे
जींस पहने लाल रूमाल बांधे
हनुमान जी के पास
तिलक लगाए कुछ लोग खड़े थे
उनको पुजारी कहा जाता था
कुछ दुकानदारों ने
जबरदस्ती मुझे रोक कर
मिठाइया  बेचीं
पुजारी ने एक टुकड़ा प्रतिमा पर फेंका
वापस लौटाया
उसे प्रसाद का नाम दिया जाता है
लोग लोट कर प्रार्थना कर रहे थे
एक व्यक्ति चन्दन लिए बैठा था
चन्दन लगाने बाद
अर्थपूर्ण निगाहों से देखता था
शायद रूपये दो रूपये मिले
कुछ दूर पर पुलिस वाले बैठे थे
पान मसाला मुह में दबाये
भेडियो जैसी नजरोवाले
लडकियों को घूरते
मै आगे बढ़ा
अचानक
एक आदमी ने मुझे तिलक लगाया
और बोला दक्षिणा   दो
मैंने एक रूपये बढाए तो बोला
हट पापी इक्कीस रूपये से काम नहीं
मजबूरन दिए
आगे कई भिकारी जिनमे
हट्टे कटते नौजवान ज्यादा थे
दाढ़ी रखे रामनामी ओढ़े कालीचीकट
मैल से दुर्गंधित
वे उन्ही पुजारियों के भाई बंद थे
मुझे घेरा और धमकी भरी याचना की
खैर मैंने उन सबको थोडा -थोडा
प्रसाद दिया
अब भला  क्या बचता
पांच रूपये के प्रसाद में
एक मिठाई बची थी
अचानक एक बन्दर ऊपर से कूदा
वह मिठाई भी गयी हाथ से
मै खाली हाथ वापस चला 
दोपहर का सूरज जल रहा था
दिल मेरा भी जल रहा था
मैंने हनुमान जी से अनुरोध किया
ऐसी घटिया जगह छोड़ कर
मेरे मन में बसों प्रभू
अन्दर से कही एक आवाज गूंजी
अरे मूर्ख मै कभी भी
ऐसी जगहों पर नहीं रहता
जरा मन का गर्द तो झाड़ पोंछ
मै तेरे दिल में ही हूँ बच्चे
मै तेरे दिल में ही हूँ बच्चे
एक बार भाव से तो देख सही पगले
एक प्रकाश का झरना फूटा
मै आलोकित होता गया
और इष्ट के साक्षात् दर्शन किये
ना किसी मंदिर में
बस अपने दिल में
बस अपने दिल में